चंबा के अंर्तराष्ट्रीय मिंजर मेले का हुआ धूमधाम से आगाज

17वीं सदी से चली आ रही परंपरा इस बार भी दोहराया गया। चंबा के मिर्जा परिवार द्वारा अपने हाथों से बनाई मिंजर अर्पित कर परंपरागत अंदाज में ऐतिहासिक चंबा मिंजर मेले का आगाज किया। धार्मिक सौहार्दभाईचारे के प्रतीक इस मेले को हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय के लोग सदियों से मिलजुल मनाते रहे है।

चंबा के अंर्तराष्ट्रीय मिंजर मेले का हुआ धूमधाम से आगाज
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मिर्जा परिवार, मंदिर के पुजारी, जिला प्रशासन और नगर परिषद चंबा के पदाधिकारियों ने शहर के मंदिरों में पूजा अर्चना की और मिंजर को अर्पित करने के पश्चात चौगन मैदान तक शोभायात्रा निकाली गई। प्राचीन समय में यहा पशु बलि दी जाती थी।

जीवित भैंसे को रावी नदी में छोड़ा जाता था, लेकिन अब पशुबलि को बंद कर दिया गया है और इसके स्थान पर नारियल अर्पित किया जाता है। इस ऐतिहासिक अंतर्राष्ट्रीय मेले में कई राज्यों के व्यापारी अपने स्टॉल लगाते है। यहां हर बार मेलो में करोड़ो का कारोबार होता है। हाथ से बनाई वस्तुएं यहां खूब बिक्री होती है।

चंबा के अंर्तराष्ट्रीय मिंजर मेले का हुआ धूमधाम से आगाज
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मुगलकाल में शाहजहां के शासनकाल में 1641 में राजा पृथ्वी सिंह भगवान रघुनाथ के चिन्ह को चंबा ल कर आए थे ।शाहजहां ने मिर्जा साफी बेग को राजदूत के रूप में नियुक्त कर चंबा भेजा था। मिर्जा परिवार को जरी और गोटे के काम मैं महारत हासिल थी। साफी बेग ने रघुनाथ को सर्वप्रथम मिंजर चढ़ाई और यहां से यह परंपरा शुरू हो गई। राजा पृथ्वी सिंह के एलान के बाद हरी मेला शुरू हुई।

स्त्रोत: अमर उजाला

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